ये ज़िन्दगी भी बड़ी अजीब है....अजीब यूँ कि जब सब सही चल रहा होगा और आपको लगेगा कि परिस्थिति बिल्कुल आपके अनुकूल है तभी ज़िन्दगी आपको कुछ ऐसे रंग दिखला देगी जिसके लिए आप बिल्कुल तैयार न हों...
शायद वो ये साबित करना चाहती है कि उसे हमारे ऊपर वर्चस्वता हासिल है...और हम उसके सामने रोते गिडगिडाते हुए अंत में हालात से समझौता कर लेते हैं...
क्या करें ज़िन्दगी से इतना प्यार जो करते हैं हम..इसे अपने अन्दर जिंदा रखने कि चाहत मौत तक रखते हैं..उससे भले ही लाखों सवाल करते हों, लड़ते हों, झगड़ते हों पर उसे नाराज़ नहीं करना चाहते...
शायद ज़िन्दगी ने हमारे अंतर्मन को पढ़ लिया है...इसलिए तो वो समय समय पर हमारे ऊपर अधिकार जताती है...हमसे छोटे बच्चे की तरह रूठ जाती है और हम उसे तब तक मनाते हैं जब तक वो सीने से लगकर रो ना पड़ती है..
और ये रूठने मानाने का सिलसिला लगातार चलता रहता है...तब तक जब तक वो हमें छोड़ कर चली नहीं जाती...
"हमेशा के लिए".....
hmmm...nice one again... but according to me.. zindagi to humse hai.. agar hum nahi to ruth kar ya hume pareshan karke use kya milega... wo zindagi nahi jo hume control karti hai.. wo hum hai jo zindagi ko control karne dete hain... jis din react karna band kar denge... zindagi hamare sahare bina kuch nahi... kya kehti ho???
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